भारत में शैक्षिक असमानता :
Topic को पढते हुऐ मन में उपजे विचार
जब छोटे थे तब कक्षा की पहली बेंच और आख़िरी बेंच पर बैठे हुए बच्चों में भेद करना जानते थे. पहली बेंच पर सेब जैसे गालों और परी जैसे बालों वाले होशियार और टीचर के दुलारे बच्चे. आख़िरी बेंच पर काले, कुम्हलाये, बहती नाक और उजड़े बालों वाले माँ-बाप और टीचर की दुनिया से बेख़बर निहायत ही बुद्धू बच्चे. इन दो बेंचों का फ़ासला तय करते कुछ हमारे जैसे बच्चे जो ना इधर के, ना उधर के या फिर दोस्ती की सहूलियत के हिसाब से कभी इधर और कभी उधर के हो लिए. ये महज़ कुछ बेंच भर का फ़ासला नहीं था. ये फ़ासला वर्ग, जाति, रंग, विश्वास-आत्मविश्वास, तथाकथित अच्छे-बुरे और मालूम-नामालूम का फ़ासला था. बढ़िया उपजाऊ पृष्ठभूमि से आये बच्चों पर मास्टर या मास्टरनियों को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी सो वो हो गए उनके 'फ़ेवरेट' और ज़िंदगी में अव्वल. आख़िरी बेंच वाले 'क्लास' को भद्दा और कुरूप बनाते थे सो उनके पीछे मेहनत तो ना की गयी, अव्वल उनके हाथ पिटाई, धुनाई, तरह-तरह के तमगे (जिन्हें कोई लेना नहीं चाहता था) और चुटकुले आये. उन्हें इस हद तक कोसा गया कि वे ख़ुद अपनी मनमर्ज़ी से स्कूल छोड़ दें तो टीचर का भी काम कम और स्कूल की सुन्दरता में भी चार-चाँद लग जायें !
ईमानदारी से कहता दोस्तो हूँ कि नर्सरी की उस कक्षा से आज विश्वविद्यालयों और बड़े-बड़े संस्थानों में तक उन बेंचों के बीच का फ़ासला मिटा नहीं है बल्कि समय के साथ बढ़ता ही गया है. !!